Echo गूँज

Echo

– Alexander Pushkin, tr. into English by Micheal Mesic

If beasts within a silent forest moan,
If trumpets sound, if thunder rolls and cracks,
Or young girls sing almost inaudibly –
For each initial tone
The atmosphere resounds quite suddenly
With a response, your own.

You listen to the peal of distant thunder
The rumbling voice of violent waves and storm,
And hear the village shepherd’s lonely cry –
And then you send your answer,
But hear no echo, there is no reply…
This also, poet, is your nature.

pushkin

गूँज

अगर हैवान ख़ामोश जंगल में कराहें,
अगर बजें तरम, अगर गरज लुड़के कड़कड़ाये,
या जवान लड़कियाँ तक़रीबन इशारों में गायें-
हर एक इब्तिदाई सुर के लिए
फ़िज़ा गूंजे यकायक
एक जवाब के साथ, तुम्हारा अपना

सुनते हो तुम दूर गड़गड़ाते गरज को,
पुरतशद्दू लहरों और तूफ़ान की बेचैन आवाज़,
और सुनो गाँव के चराहे की तनहा फ़रयाद –
और फिर भेजो जवाब अपना,
सुनो मत गूँज लेकिन, है न कोई जवाब …
ये भी, शायर, है तुम्हारी फितरत