जंग -ए- नजीब

जामिया, नजीब से

हैं हर्फ़न मौला यक़ीन ये दिलाते, डिग्रियों का अम्बार था एक ड्रामा बस
अकबर बनने चले, शहनशा-ए-जामिया के तख़ल्लुस से ही रह गए बस

जामिया के तलबा, नजीब से

कितनी फ़ीस बढ़ाओगे, कितने बैन हम पे लगाओगे
करोगे हमें बस सस्पेंड ही या कुछ सिखा भी जाओगे

जामिया के कम्युनिस्ट तलबा, नजीब से

अरे थूक भी दो ग़ुस्सा नजीब, हो तुम बदतमीज़ अजीब
सुना है कैंपस में लाल झंडे को समझते हो अपना रक़ीब

आप, नजीब से

कितनी अपनी चलाओगे, कितनो को ठिकाने लगाओगे
नजीब करोगे इतना ही सितम तो रहम किस पे खाओगे

दिल्ली, नजीब से

कब तक भाजपा के कंप्लायंस पे अम्बानी के रिलायंस से यूँ हमें लुटाओगे
फ़िरक़ा परस्तों व सरमायादारों को हँसा खिला के मज़लूमों को पिसवाओगे