सिर्फ़ उनके लिये

हर एक बला कमतर है
हर एक फन अधूरा है

कभी कहो बस अब और नहीं
मसीहा मार्क्स अब आएगा नहीं

ये बताओ तो कौन है सही
बात पे तो कोई डटा नहीं

तुम भी तो कभी शबनम कभी
शोले की तरह बिख़र जाते हो

इस तन्क़ीद के क्या मायने
उस इंक़िलाब से क्या फ़ायदे

हम न शायर उस फ़रमान के जो सिखाए किसको
शेर कहने के अरमानों की ही इजाज़त न जिसको

अब तो बुदबुदाई दुआओं का ही है सहारा
जब रहे क़ैदख़ानों में मोडरेट फन हमारा