भाई

 

उफ़! चोटिल को फिर घायल किये क्या मिला मेरे भाई

कुछ रोज़ पहले भी तो यूँ ही कहा था न तुमने भाई

 

रिलकेह के ख़त पढ़े हैं हमने, बुकोवस्की के सख्त ओ सुख़न वार भी 

चलो एक और नसीहत ही सही, तुम्हारी भी साथ लिए चलते हैं भाई

 

ग़ार के गुप अँधेरे में छिपे बैठे थे, चलो अब हुआ आइना ऎ दीदार भी

हम तो डरे बैठे थे आहट से, क्या था पता गोला बम्ब बरसाओगे भाई

 

मान लिया कमतर है फन हमारा, हम कब केह बैठे ताज हमारा

अफवाएं गर्म हैं बहुत सी, है बेहिसी की आदत जो पड़ी भारी भाई

 

अदब न हमारा न तुम्हारा जाने, चुप रहना लेकिन कोई तुमसे जाने

लुग़त दुबकाए बग़ल में निआज़ी, सुन भी लो अब बात पते की भाई