नज़्म थक चुकी है

किस के लिए लिखी है
नज़्म थक चुकी है
जंग अमन इश्क और बेवाफायी
घिस पिट चुकी है
फिर भी तुम पूछो
किस किस को लिखी है

तन्हाई घोट घोट के पी चुकी है
सिवाए तुम्हारे, किसी और की तारीफ लिखी है
उफ़ वो गुस्सा तुम्हारा मज़मून अपने आप में
नज़्म थक चुकी है
बस बक बक बहुत हो चुकी है
नींद रौशनी में नूर हो चुकी है

कमरे में जलन की बू सता रही है
बाहर हवा में बेरुख़ी सी छा रही है
चाँद थक चूका है
रात बिल बिलाके पास बुला रही है
नज़्म थक चुकी है
जिसके लिए लिखी थी, सहर के शीरे में घुले जा रही है