अक़्ल बढ़ी या अक़लियत!

(After AMU VC’s call for wearing Sherwanis if students wish to meet him, even informally! )

मैं सोचता हूँ बाप दादा तो मेरे भी ज़मींदार होंगे
बदसलूकियां तो उनसे भी हुई होंगी, अनजाने में ही सही

“अरे कैसी बदसलूकी, नूर था उनके चेहरों पे नूर
और उस ज़माने में तो बस, ऐश ही ऐश
दालान में चारपाई बिछा के, मुलाज़िम से शिकार का गोश्त बनवाना
वाह, नवाबियत ही नवाबियत!”

लेकिन थे तो हम मौलवी, नवाब कब बन गए
बड़ी हवेली के हम पाशिंदे, सरकार कब बन गए

अरे मियाँ छोड़ो ये सब बातें, तुम तो देखो आज भी
अलीगढ़ के लोंडो में कितनी है सलाहियत

वाईस चांसलर वहां के बोले, ग़ैर रस्मी तोर पे हैं मिलने को वो राज़ी
मिलना हो, मगर बिना शेरवानी के नहीं, याद रहे पाजी
और हो अगर सिलने गयी, दर्जी के पास तुम्हारी शेरवानी
तो मत झिझको, पड़ोसी से ही क्यूँ न उधार लो महरबानी
लेकिन पहनों साला सिर्फ शेरवानी

“क्या हसीन अचकन, क्या हसीन टोपी, क्या मलमल का कपड़ा”

फ़्री की तो नहीं बनती आजकल क्या शेरवानी? नयी हो या पुरानी ?
फ़्री तो हिमाक़त भी नहीं मेरे दोस्त, जल्द ज़रूर आएगी शामत तुम्हारी

“अमा हिमाकत नहीं ये यार, तहज़ीब से ही तो होगा वाक़ार में हमारे इज़ाफा
बाकी कान्धुओं का क्या, लीचर हैं लीचर रहेंगे, उनका क्या घाटा क्या मुनाफा”

ज़िक्र बाक़ायदा haves और have nots का करते हैं
सर सय्यद ,जदीद और साइंस की तज़बी पढ़ते हैं
और एक ही सांस में लिबास को आज भी काबिल इ ज़िक्र बना देते हैं
रिवायतों के हवाले, चुप चाप, ड्रेस कोड को लाज़मी करार देते हैं