मसला ए संगीन

आज हमने एक बम बनाया
जूते, चप्पोलों और प्लास्टिक के cupओ को जलाया
जले मरे फेफ्ढ़ो को फिर से फढ़फढ़ाया
table पर रखी हर चीज़ को भिखेर, फिर से सजाया
रात के अँधेरे में धुए को फिर से बुझाया

काश उस बम में असला और बारूद होता
जो इन ऊची दीवारों के खड़े होते ही इन्हें ढहाता
धुल और मिटटी में सने, मुझे और तुम्हे भहलाता
सिखाता के इस दरिया ए दर्द का बहाना , है सिर्फ एक बहाना
कहना मानना सिखाता और ज़िद पे अढ़े रहने को बचपना समझाता

मसले और भी हैं , मगर मत पूछो मसला ए संगीन कौनसा
रंगीन रात की सर्द हवाओं में, थके , कमरे पे लोट, दिन के किसी भी वादे को न निभाना