इश्क़ से बेतुका मज़ाक़

In response to two of Akhil Katyal’s poems :

तुम कोई मेट्रो स्टेशन होती

and The Biopic Lecture

शक की निगाहों से, सही नहीं है देखना, इश्क़ को
जाने ज़ालिम कब से अधमरा सा पढ़ा है
madman सा love करे या batman सा वार
जाने कितने गुल खिलाये, जाने कितने पिलाए जाम

और तुम भूल गए ये सब, love को बनाने चले एक typo
याद नहीं, those poems that you wrote me, जिनमे
बना दिया था मुझे, symbols में एक metrostation
कोई बात नहीं, इत्तेफ़ाक़ से तो हो नहीं सकती ये एक ग़लती

रग रग से वाकिफ हूँ तुम्हारी, बेवक़ूफ़ किसी और को बनाना
biopic lecture के बहाने, मुझसे कहीं फिर दूर न चले जाना